Friday, November 30, 2012

राजनीति की निकृष्ट स्वरूप है व्यक्तिवादी विरोध: सिद्धार्थ मिश्र ‘स्वतंत्र’

कांग्रेस के लाख भ्रमजाल बिछाने के बावजूद लोगों के दिलोदिमाग से मोदी की विकास पुरूष वाली छवि नहीं मिटती । पूरे देश में इन दिनों नरेंद्र मोदी के विरूद्ध कांग्रेस प्रायोजित मीडिया वार चल रहा हो । विभिन्न न्यूज चैनलों पर चल रहे विज्ञापन पर गौर फरमाइयेगा । गुजरात कांग्रेस के नाम से चल रहे एक विज्ञापन में विभिन्न लिपे पुते चेहरों द्वारा गुजरात के विकास का पदार्फाश का दावा बड़ी बेशर्मी से किया जा रहा है । इस विज्ञापन में आम गुजरातियों के बयानों से ये साबित करने का प्रयास किया जा रहा है कि गुजरात का विकास सिर्फ कुछ प्रभावशाली व्यक्तियों तक सीमित है । अब ये बताने की आवश्यकता नहीं है कि विभिन्न न्यूज चैनलों पर इस तरह के विज्ञापन को दिन रात चलाने के लिये कितना पैसा खर्च किया जा रहा है । स्मरण रहे कि भारतीय राजनीति में इस तरह का व्यक्तिवादी विरोध शायद ही कभी हुआ हो । यदि इन सब के बावजूद भी कांग्रेस कहीं पराजित हो जाए तो सोचीये क्या परिणाम होंगे । इस चर्चा के क्रम में एक बात का और उल्लेख करना चाहूंगा कि सब के बीच में नरेंद्र मोदी ने एक बार भी स्वयं को प्रधानमंत्री की कुर्सी का दावेदार नहीं बताया है । गुजरात केंद्रित राजीनीति के बावजूद उन्हे पूरे देश की जनता द्वारा प्रधानमंत्री पद का दावेदार बनाया गया । इस बात की प्रमाणिकता को कुछ दिनों पूर्व ही इन्हीं न्यूज चैनलों ने प्रमाणित किया था । अब न्यूज चैनलों का ये रवैया थूक कर चाटने से ज्यादा क्या है? इन सभी बातों को एक साथ लेकर देखें तो कांग्रेस को इस बार भी गुजरात में अपनी संभावना न के बराबर ही दिख रही है । यहां कांग्रेस के बड़े बड़े नेताओं और न्यूज चैनलों पर हो रहे दिन रात दावों पर मत जाइयेगा । ऐसे ही दावे बीते चुनावों मंे भी कांग्रेसी दिग्गजों ने किये थे ।
मोदी के इस बढ़ते कद को समझने के लिये पहले हमें उनके व्यक्तित्व को समझना होगा । इस बात को राजनैतिक कसौटी पर नहीं कसने की कोशिश बेमानी होगी । अतः दागी बनाने की प्रक्रिया में विभिन्न सियासी पार्टियों के सेक्यूलर सूरमाओं ने उन्हे गुजरात दंगे का दोषी बताया । हांलाकि ये बात आज तक किसी भी प्रकार प्रमाणित नहीं हो सकी है । इस मामले की गहराई ये बात बिल्कुल स्पष्ट हो जाती है कि ये दंगा वास्तव में एक प्रतिक्रियात्मक घटना । अर्थात अयोध्या से लौट रहे कारसेवकों के जिंदा जले शव को देखने के तुरंत बाद आम जन मानस की प्रतिक्रिया । ये दुर्भाग्यपूर्ण है कि लोगों की प्रतिक्रिया इस विभत्स रूप में निकली । किंतुु सिर्फ मुख्यमंत्री होने के नाते मोदी को इस घटना का दोषी नहीं बनाया जा सकता । अगर वास्तव में मुख्यमंत्री प्रदेश में घटने वाली प्रत्येक घटना का जिम्मेवार होता है तो ये फार्मूला कांग्रेस शासित प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों पर भी लागू होना चाहिये । यथा मुंबई और असम समेत विभिन्न प्रदेशों में हुये दंगों के लिये भी मुख्यमंत्रियों को कटघरे में खड़ा होना पड़ेगा । गुजरात में दस वर्ष पूर्व घटित घटना के लिये यदि मोदी को आज भी कोसा जाता है तो तरूण गोगोई और पृथ्वीराज चव्हाण निर्दोष कैसे माने जा सकते हैं? कांग्रेस और देश के अन्य तथाकथित सेक्यूलरों का ये निकृष्ट रवैया क्या न्याय के दोहरे मापदंडों को नहीं दर्शाता?
राजनीति के वर्तमान तौर तरीकों को देखकर तो यही लगता है कि या तो आज के राजनेता मानसिक रूप से विक्षिप्त हो चुके हैं अथवा उनका लक्ष्य सस्ता मुद्दे उछालकर कुर्सी हथियाना मात्र रह गया है । बीते दिनों प्रसिद्ध मुस्लिम नेता और वाइंट कमेटी के अध्यक्ष सैयद शहाबुद्दीन ने एक विवादास्पद बयान दिया । उन्होने खासे हास्यास्पद ढ़ंग से वोट बैंक का लालीपाप दिखाकर मोदी को गुजरात दंगों के लिये माफी मांगने को कह डाला । बात यहां तक तो फिर भी ठीक थी लेकिन हद तो तब हुई जब हैदराबाद के सांसद और एआईएमआईएम के अध्यक्ष अकबरूद्दीन ओवैसी ने कहा कि नरेंद्र मोदी को अपनी बाकी जिंदगी जेल में बितानी चाहिये । मोदी को यदि प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया गया तो परिणाम भयानक होंगे । विचारणीय प्रश्न है इस तरह के राजनीतिक बयान क्या साबित करते हैं ? ये तो हद ही हो गई कोई माफी मंगवा रहा है तो कोई गंभीर परिणामों की धमकी दे रहा है । क्या हम वाकई लोकतंत्र में जी रहे हैं ? कहीं हमारी राजनीति तुष्टिकरण की राह पर चलकर कबीलाई संस्कृति का गुलाम तो नहीं हो गई है ? बयान और भी हैं जिनसे आप और हम सभी परिचित हैं । इन बयानों से सिर्फ एक बात साबित होती है कि मोदी विरोध में जुटे ये सारे राजनेता व्यक्तिगत तौर पर उनकी कुशल प्रशासक की छवि से डरते हैं । यही कारण है महंगाई,भ्रष्टाचार और देशद्रोह जैसे मुद्दों पर भले ही सभी अपनी ढ़पली अपना राग बजाते हों लेकिन मोदी के विरोध को लेकर सारे मंदबुद्धि सेक्यूलर एकमत हैं ।
बहरहाल बात खुलासों की हो दिग्विजय जी की चर्चा न हो तो बात कुछ अधूरी लगती है । आपको याद होगा दिग्गी राजा ने कुछ दिनों पूर्व मोदीजी की पत्नी को ढ़ूढ़ निकाला । ये करके शायद उन्हे लगा होगा कि उन्होने सदी की सबसे बड़ी खोज की है । अफसोस की बात है उनकी इस खोज को लोगों ने नकार दिया । सोचने वाली बात इन तमाम घटनाओं से यदि यशोदा बेन को कोई समस्या नहीं है तो नहीं है तो दिग्विजय बाबू इतने परेशान क्यों हैं? इन सारी बातों को सामने रखने का मेरा प्रयोजन सिर्फ इतना दर्शाना है कि भारतीय राजनीति अपने निकृष्ट स्तर पर पहुंच गई है । यहां उसे पत्रकारों का भी भरपूर समर्थन मिल रहा है फिर बात चाहे ओछे विज्ञापनों की हो या उटपटांग न्यूज पैकेज की । नरेंद्र मोदी को पतित बताने वालों से मेरे भी कुछ प्रश्न हैं:
1ः गोधरा में 25 महिलाओं और 15 बच्चों समेत 59 लोगों को जिंदा जला देने की घटना को क्या न्यायसंगत कहा जा सकता है ?
2 कश्मीर में तैनात सुरक्षाबलों पर पत्थर बरसाना क्या देशद्रोह नहीं है ?
3 देश की भावना के विपरीत शरीयत कानूनों की मांग कहां तक जायज है ?
4 गोधरा दंगों पर जहर उगलने वालों को क्या दस वर्षों से शांतिपूर्ण ढ़ंग से विकास के सोपान चढ़ता गुजरात नहीं दिखता ?
5 मंदबुद्धि सेक्यूलरों के इस आचरण से क्या भारतीय चुनाव पद्धति का अनादर नहीं होता ?
ऐसे और भी कई क्यों हैं जो आमजनमानस के जेहन में दर्ज हैं । मोदी को मुस्लिम विरोधी बताने वाले अक्सर ये भूल जाते हैं कि अन्य राज्यों की अपेक्षा गुजरात में मुसलमानों की प्रतिव्यक्ति आय सबसे ज्यादा है । बात अगर सरकारी नौकरियों की करें इसमें मुसलमानों की भागीदारी 9 प्रतिशत से ज्यादा है और तो और गुजरात पुलिस में भी मुसलमानों की संख्या अन्य प्रदेशों की तुलना में कहीं ज्यादा है । अंततः ये सारे आंकड़े सरकारी हैं जिसका सरोकार कहीं न कहीं सेक्यूलर कांग्रेस सरकार से जुड़ा है । ऐसे में अगर दुश्मन भी आपकी तारीफ करे तो ये तो मानना ही पड़ेगा कि गुजरात ने वाकई तरक्की की है ।

Friday, November 23, 2012

फांसी के पीछे की स्याह सियासत: सिद्धार्थ मिश्र‘स्वतंत्र’



देश की अखंडता पर कुठाराघात करने वाले कसाब को इस दुनिया से रूखसत हुए 48 घंटे से भी ज्यादा हो गये । इसके बावजूद आमजन की चर्चाओं में वो आज भी जिंदा है । ये बात कहने से मेरा आशय है उसकी मौत पर छिड़ी सियासी चर्चाएं । स्मरण रहे कि आमजन के बीच होने वाली चर्चाओं को ज्यादा तवज्जो नहीं मिलती,अतः आमजन के बीच चल रही बातें एक स्तर के बाद दम तोड़ देती हैं । अब जब की कसाब मर चुका है तो माजरा है उसकी मौत का श्रेय लूटने का । बड़े अफसोस की बात है कि कांग्रेसी नेता बयान देते वक्त आगे पीछे कुछ भी नहीं सोचते । उनकी ये गलतफहमी की जनता बेवकूफ है,कई बार ऐसे बयान भी दिलवा देती है जिससे उनके आपस के बयानों में ही विरोधाभास साफ झलकने लगता है । यथा महाराष्ट सरकार में राक्रांपा पार्टी के कोटे से गृहमंत्री की कुर्सी पर विराजमान आर आर पाटिल ने कहा कि वो इसकी तैयारी दो महीने पहले से कर रहे थे । इस मामले में जमीनी हकीकत जो अखबारों और अन्य  विश्वस्त सूत्रों से हमारे सामने आई वो ये है कि कसाब की दया याचिका प्रणब दा ने इसी महीने की 5 तारीख को नामंजूर की थी । विचारणीय प्रश्न है कि जो मुद्दा 5 नवंबर तक अधर में था उस पर कैसी तैयारी ? दूसरी बात या तो उन्हे भविष्य का पूर्वानुमान हो जाता है? तीसरी और सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि एक प्रदेश का गृहमंत्रालय संभालने वाले नेता की केंद्र के फैसलों में कितनी दखल होती है? बहुधा तो नहीं होती यदि वास्तव में ऐसा है तो ये खेदजनक बात है । जो मामला सर्वोच्च न्यायालय से होते हुए सत्ता के सर्वोच्च शिखर तक पहुंचा उस मामले में पाटिल साहब की क्या भूमिका रह जाती है? अतः प्रथम दृष्टया अगर देखें तो ये मामला साफतौर बयानबाजी से समां लूटने का ही लगता है । बहरहाल कांग्रेस में बयानों से सनसनी फैलाने वाले नेताआंे की एक पूरी कतार है । इस मामले में अगला बयान आया माननीय शिंदे साहब का तो उन्होने अपनी महत्ता दर्शाने में कोई कसर नहीं उठा रखी । उन्होने कहा कि इस बात की खबर सोनिया जी तो दूर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह तक को नहीं थी । सोचिये उनके इस बयान से क्या संदेश क्या निकलते हैं ? मनमोहन जी का अपने मंत्रियों पर कोई नियंत्रण नहीं है ? अथवा केंद्र सरकार के मंत्रियों के बीच किसी भी बड़े मुद्दे पर निर्णय लेने से पूर्व आपसी चर्चा तक नहीं होती ? स्मरण रहे कि ये शिंदे साहब वही व्यक्ति हैं जिन्होने गृह मंत्रालय संभालने के तत्काल बाद कांग्रेस की परंपरा का निर्वाह करते हुए माननीय सोनिया जी के प्रति कृतज्ञता प्रकट की थी । व्यवहारिक तौर पर भी देखें कांग्रेस पार्टी का कोई भी निर्णय गांधी परिवार की बगैर सहमति के नहीं लिया जाता । इसी क्रम में कांग्रेस के अन्य बड़े नेताओं ने भी शब्दों की लफ्फाजी से गुरेज नहीं किया । अतः इन सभी बातों का सार तत्व बस इतना है कि इन्ही बयानों के माध्यम से कांग्रेस अपने इस मजबूरन लिये गये फैसले को बासी नहीं पड़ने देना चाहती ।
उपरोक्त पंक्तियों में प्रयोग किये गये शब्द मजबूरन लिये गये फैसले से मेरा आशय स्पष्ट है । एक ऐसा फैसला जिसको लिये बिना सत्ता का संचालन फिलहाल मनमोहन जी के लिये मुश्किल हो चला था । इस बात को कुछ दिनों पूर्व ही लिये गये मुलायम सिंह यादव के निर्णय से समझा जा सकता है । उन्होने  आगामी लोकसभा चुनावों के मद्देनजर उत्तर प्रदेश की 55 लोकसभा सीटों पर अपने प्रत्याशियों की घोषणा कर दी । प्रत्याशियों की घोषणा के समय दिये अपने बयान में उन्होनें सपा कार्यकर्ताओं का उत्साहवर्धन करते हुए कहा था कि देश में मध्यावधी चुनावों की पूरी संभावना है । यह भी संभव है कि आगामी चुनाव 2014 के स्थान पर 2013 में ही हो जाएं । ध्यातव्य हो कि सरकार को बाहर से समर्थन देकर स्थिर बनाये रखने वाले दल के प्रमुख नेता का ये बयान क्या प्रदर्शित करता है? दूसरी ओर उत्तर प्रदेश की ही एक अन्य सियासी सूरमा मायावती के तेवर विगत कुछ दिनों से बदल रहे हैं । इस बात को ऐसे भी समझा जा सकता है उत्तर प्रदेश के सपा और बसपा जैसे दोनों ही दल सियासी मजबूरियों के चलते कांग्रेस समर्थित सरकार को बाहर से समर्थन दे रहे हैं । इन हालातों में इनमें से कोई भी दल कड़े तेवर दिखाता तो दूसरा अपने आप ही बगावत कर सरकार को गिरा देगा । इस वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य को देखते हुए मनमोहन सरकार पर बढ़ते दबाव का सहज ही अंदाजा लगाय जा सकता है । महंगाई,घोटाले समेत विभिन्न मुद्दों में घिरी कांग्रेस को वापसी के लिये पलटवार करना मजबूरी बन गया था । अतः कसाब की फांसी ने कहीं न कहीं कांग्रेस को बड़ी राहत दे दी है । अर्थात उसे एक ऐसा मुद्दा मिल गया है जिसपे यदि सरकार जाती है तो उसे जनता की सहानुभूति मिलने की पूरी संभावना है ।
इस मामले के दूसरे पक्ष को देखें तो वो और भी प्रासंगिक है । गुजरात में होने वाले विधानसभा चुनाव,इन चुनावों के पूर्व के कांग्रेसी इतिहास को उठाकर देखें तो कांग्रेस गुजरात में अपनी आखिरी संासें गिन रही है । अब प्रश्न है कांग्रेस को आगामी चुनावों में अपना अस्तित्व प्रदर्शित करने का । यहां सबसे मुख्य बात है नरेंद्र मोदी का बढ़ता कद । गुजरात के समीकरणों को अगर ध्यान से देखें तो यहां का राजनीतिक समीकरण कांग्रेस अथवा भाजपा बनाम नहीं रह गया । यहां का मामला नरेंद्र मोदी बनाम अन्य हो चुका है । इस बात को लाख दरकिनार करने का प्रयास किया जाय लेकिन गुजरात का बीते दस वर्षों का इतिहास तो यही साबित करता है । इस मुद्दे पर अमेरिका,ब्रिटेन समेत विभिन्न बड़े देशों की मुहर लग जाने से ये बात कांग्रेस के गले में फांस की तरह चुभ रही है । तब से अब में कुछ भी नहीं बदला है न तो कांग्रेस ने कोई बड़ा तीर मारा और न ही मोदी का नाम किसी घोटाले के साथ जुडा है । इस बात को कांग्रेस द्वारा विभिन्न न्यूज चैनलों पर चलाए रहे विज्ञापनों से भी समझी जा सकती है। अंततः कांग्रेस जिस बात से अति उत्साहित है वो है केशु भाई पटेल की बगावत । कांग्रेस इस मुद्दे को भुनाने में कोई भी कसर बाकी नहीं छोड़ना चाहती । हांलाकि ये सब कर के भी कांग्रेस एक भारी भूल कर रही है कि फिलहाल मोदी के व्यक्तित्व को इस तरह की बगावतों से कोई फर्क नहीं पड़ता । फिर चाहे बात शंकर सिंह बाघेला की हो या संजय जोशी की अथवा अब केशुभाई पटेल की । नरेंद्र मोदी की इस अजेय छवि का संबंध कहीं न कहीं उनके देश प्रेम से जुड़े सरोकारों को भी जाता है । ऐसे में कसाब जैसे आतंकी को जिसे चार साल तक भली भांति पाला पोसा गया को अचानक फांसी देने का क्या तुक बनता है । कारण स्पष्ट है स्वयं को देशभक्त दल के रूप में जनता के बीच प्रस्तुत करना ।
कसाब को अचानक फांसी देने का एक कारण और भी हो सकता है । शतरंज के खेल में शह और मात के बीच राजा को बचाने के लिये कई बार प्यादों की बली भी दी जाती है । जहां तक कसाब का प्रश्न है तो वो पाकिस्तान से चलने से पूर्व ही इस तल्ख हकीकत से भली भांति परिचित था कि उसे मरना है । उसकी भूमिका निश्चित तौर पर देश की आर्थिक राजधानी मुंबई को खौफजदा करने से जुड़ी थी । यहां प्रश्न उठता है कि क्या हमारे राजनेता अपनी देश से जुड़ी जिम्मेदारियों का कुशलतापूर्वक निर्वाह कर पाये ? जवाब हमेंशा ना में ही मिलेगा । कसाब की फांसी की घटना को भी देखीये तो ये भी मजबूरी में लिया गया निर्णय लगता है । अन्यथा क्या वजह है कि कसाब की फांसी का कोई भी आधिकारिक वीडियो सरकार द्वारा जारी नहीं किया गया ? वीडियो तो दूर की बात है भारत सरकार ने उसकी मृत फोटो तक जारी करने की जहमत नहीं उठाई । यहां सबसे बड़ी बात है जल्दबाजी में उसे यरवदा जेल में दफना देना । इन सारे तथ्यों से एक बात स्पष्ट हो जाती है कि ये सरकार का दृढ़ता से लिया गया नहीं वरन मजबूरी में लिया गया निर्णय है । मामले को अंजाम तक पहुंचाने तक की गोपनीयता की बात तो समझ में आती है लेकिन उसके बाद की गोपनियता वाकई संदिग्ध है । किस बात से डरी हुई थी सरकार ?या ऐसे कौन से लोग हैं जिन्हे कसाब की मौत से कष्ट हुआ होगा? बताने की आवश्यकता नहीं है कि वे लोग कौन हैं । अब ये बात यहीं से अफजल गुरू तक पहुंच जाती है । स्मरण रहे कि संसद पर हमले के मास्टर माइंड अफजल गुरू की फांसी का मामला कसाब से तीन वर्ष पूर्व का है । अगर वैधानिक प्रक्रियाआंे के हिसाब से क्रमवार सजा देने की बात की जाय तो अफजल गुरू का क्रम निश्चित तौर पर कसाब से पहले ही आता । क्या वजह है अफजल के मामले को लटकाने की? ध्यान दीजियेगा कांग्रेस की राजनीति शुरूआत से ही वोटबैंक केंद्रित रही है । इस दल पर अक्सर ही तुष्टिकरण अथवा बांग्लादेशी घुसपैठियों को संरक्षण देने के आरोप भी लगते रहे हैं । कांग्रेस ऐसा कोई भी निर्णय नहीं ले सकती जिससे उसका परंपरागत वोट बैंक नाराज हो । आगामी लोकसभा में अपनी वर्तमान छवि को देखते हुए उसकी वापसी भी असंभव ही है । ऐसे में एक तीर से दो शिकार करना कांग्रेस की सियासी मजबूरी थी । कसाब पर कठोर निर्णय से एक ओर तो देशभक्त मतदाताओं में उल्लास है तो दूसरी ओर इस मामले को हवा देकर उसने अफजल गुरू को संास भी दे दी है । इस बात एक कांग्रेसी कद्दावर के बयान से बखूबी समझा जा सकता है जिसमें उन्होने कहा था कि अफजल की फांसी से सुलग उठेगी काश्मीर की घाटी । ये बात क्या साबित करती है क्या देश की सत्ता पर चरमपंथियों का अघोषित कब्जा है ? अतः मास्टर माइंड को बचाने के लिये निश्चित तौर पर  प्यादे की बली देना आवश्यक हो गया था । अंततः कांग्रेस के इस चरित्र पर दुष्यंत कुमार की ये पंक्तियां काबिलेगौर हैं:
         अब किसी को भी नजर आती नहीं कोई दरार,
           घर की हर दीवार पर चिपके हैं इतने इश्तिहार ।

Thursday, November 22, 2012

क्या बाकियों के फंदे तैयार हैं: सिद्धाथ मिश्र‘स्वतंत्र’

मुंबई हमले केे दोषी कसाब की फांसी ने जाहिर तौर पर देशवासियों को सुकून दिया है । इस विषय में सबसे महत्पूर्ण बात यह है कि भारत सरकार द्वारा यह निर्णय मुंबई में हुये इस हमले की चैथी बरसी के ठीक पांच दिन पूर्व लिया गया । गौर करने वाली बात है कि सियासत और आमजनमास के विचारों में प्रायः विरोधभास पाये जाते हैं । इस मुद्दे पर भी यह  विरोधाभास स्पष्ट रूप से सामने आ ही गया । इस ऐतिहसिक हमले के खल पात्र कसाब की फांसी पर जहां एक ओर जनमानस ने संतोष व्यक्त किया तो दूसरी ओर राजनेताओं ने इस मुद्दे की आंच पर राजनीतिक रोटियां सेंकने से गुरेज नहीं किया । बहरहाल जो भी हो इस निर्णय से निकले संदेश निश्चित तौर पर स्वागत योग्य हैं । हांलाकि इस फैसले से एक ओर जहां आमजन में हर्ष है तो दूसरी ओर कई प्रश्न भी उठ खड़े हुये हैं ।
इस विषय मे सबसे बड़ा प्रश्न है कि क्या ये फैसला इस कतार में शामिल बाकियों के लिये चेतावनी है? अथवा कसाब से शुरू हुआ ये सफर कुख्यात आतंकी अफजल तक कब पहुंचेगा ? सबसे बड़ी बात ये है कि इस बड़े फैसले के बावजूद पाकिस्तान के दोगले रवैये में कोई अंतर आता नहीं दिखता । ये बात आवश्यक इसलिये भी है  िकइस हमले का मास्टर माइंड आज भी सरहद के उस पार सुरक्षित बैठा है । ज्ञात हो कि मुंबई पर हुये इस विभत्स हमले में कसाब की भूमिका मात्र एक मोहरे की ही थी । इस मोहरे को उसके अंजाम तक पहुंचाने में यदि चार साल लगे तो आकाओं का नंबर आने में कितने वर्ष और लगेंगे ? कसाब और निश्चित तौर पर मौत के खौफ से बेखौफ होकर ही भारत आए थे । बाकी नौ तो मौके पर ही मारे गये और जीवित कसाब को सजा देने में हमें नाकों चने चबाने पड़े । सबसे बड़ी बात ये है कि अगर उसकी फांसी को इतने गोपनीय ढ़ंग से अंजाम न दिया गया होता तो आज हालात कुछ दूसरे होते । देश में दंगे की आंशंका से इनकार नहीं किया जा सकता है । ऐसे में ये बात बिल्कुल स्पष्ट हो जाती है कि कसाब जैसे लोगों को संरक्षण देने का दोष कहीं न कहीं सेक्यूलर लोगों का भी है । हां इस पूरे मामले जो एक बात संतोषजनक है वो है कसाब की मौत और भारतीय न्याय प्रक्रिया के विपरीत इस मामले का शीघ्रता से निपाटारा ।
यहां एक और बात विचारणीय है हमने भले  ही कसाब को फांसी दे दी लेकिन कुटनीति की बिसात पर उसका अस्तित्व एक प्यादे से ज्यादा कुछ नहीं था । एक ऐसा प्यादा जिसके जीने या मरने से खिलाड़ी पर ज्यादा फर्क नहीं पड़ता है । अगर हमने भारत की सरजमी पर रक्तपात मचाने वालों को सबक सिखाने की ठान ली है तो शीघ्र ही कुछ और कठोर निर्णय लेने होंगे । जहां तक भारतीय राजनीति के इतिहास का प्रश्न का ये सर्वथा इसके विपरीत रहा है । अर्थात भारत के राजनेताओं ने हमेशा ही वोटबैंक की राजनीति के चक्कर में निर्वीय समझौते किये हैं । ऐसे समझौते जिनसे निश्चित तौर पर भारत की वैश्विक छवि भी धूमिल हुई है । यथा चीन द्वारा कब्जा किये गये 20 हजार वर्ग किमी भूमि की वापसी के लिये कोई पहल नहीं करना अथवा संसद पर हमले के मास्टर माइंड अफजाल गुरू पर निर्णय न ले पाना । इसके विपरीत भारत के पड़ोसी पाकिस्तान की नीति इसके सर्वथा उलट है । भारत के लापरवाह रवैये के कारण ही हाफिज सईद जैसे कुख्यात आतंकी पाकिस्तान मे खुलेआम आग उगल रहे हैं । इन परिस्थितियों में पाकिस्तान से मदद की उम्मीद करना शेखचिल्ली के दिवास्वप्न से ज्यादा कुछ नहीं है ।
अतः अब वक्त है हमें अपनी रक्षा नीति की पुनः समीक्ष करने का । कसाब के मामले को ही ले लीजिये निचली अदालत समेत सर्वोच्च न्यायालय से कसाब की सजा की पुष्टि के बावजूद भी प्रतिभा पाटिल द्वारा मामले को लटकाये रखना क्या देश की भावनाओं के साथ मजाक नहीं था ? अगर था तो ये अंधेर कब तक चलेगा कि शहीदों के परिवार अपने मेडल लौटाते रहें और संविधान के सर्वोच्च पद पर आसीन व्यक्ति कान में तेल डालकर सोते रहें । सबसे महत्वपूर्ण बात है कि कसाब की कड़ी में अभी भी लगभग सोलह लोगों के नाम और भी हैं । इन नामों में अफजल गुरू,और बलवंत सिंह राजनौरा जैसे कुख्यात लोगों के नाम भी हैं । जानकारों के अनुसार कसाब की फांसी इसलिये हो पायी क्योंकि केंद्र सरकार को कहीं से प्रतिकूल प्रतिक्रिया की आशंका नहीं थी । जबकि अन्य अभियुक्तों के मामले स्थिति बिल्कुल उलट है । इस बात को हम एक केंद्रिय मंत्री के बयान से भी समझ सकते हैं । अपने बयान में मंत्री महोदय ने कहा था कि अफजल गुरू को फांसी देने से सुलग उठेगी कश्मीर घाटी । सोचने वाली बात है कि घाटी के लोगों की भावनाओं को ध्यान में रखकर हम देशद्रोहियों को पालते रहेंगे ? यदि किसी की भावनाएं देशहित के विरूद्ध हो तो भाड़ में जाए ऐसी भावनाएं । हम यदि आतंकवाद पर लगाम लगाने की इच्छा रखते हैं तो हमें वोटबैंक की राजनीति को दरकिनार करना होगा । अतः इस फैसले पर इतराने से पूर्व हमें एक बार ये जरूर सोच लेना चाहिये कि क्या बाकी आतंकियों के लिये फंदे तैयार हैं ?


Wednesday, November 21, 2012

सत्ता का सकारात्मक संदेश: सिद्धार्थ मिश्र‘स्वतंत्र’

आज की सुबह कई मायनों में अलग थी । सुबह सवेरे पुणे के निकट यरवदा जेल में  कसाब को फांसी लगने की सूचना ने कहीं न कहीं आम जन के मन में सत्ता के प्रति विश्वास की बहाली की है । ध्यातव्य हो ये वही कसाब है जो 26 नवंबर 2008 को मुंबई के दौरान एकमात्र पकड़ा गया जीवित आतंकी था । इस दुर्दांत हमले में 238 लोग घायल और 166 लोगों की मौत हो गयी थी । मुंबई पर हमले की चैथी बरसी के ठीक पांच दिन पूर्व कसाब को फांसी पर लटकाना वास्तव में एक सकारात्मक संदेश है । नब्बे के दशक से आतंकवाद झेल रहे भारत को ऐसे कदम बहुत पहले उठाने चाहीये थे । खैर देर आये दुरूस्त आये अंततः कसाब को अपने कुकर्मों की सजा मिल गई । इस अवसर पर हमें निश्चित तौर पर महामहीम प्रणब दा के प्रति आभारी होना चाहीये । ध्यान देने वाली बात है कि राष्टपति के पास दया याचिका जाना कोई नयी बात नहीं है । उनके पूर्व भी कई लोग इस कुर्सी पर विराजे लेकिन आतंकियों के मामले पर उनकी संदिग्ध चुप्पी ने निश्चित तौर पर इस पद की गरिमा कलंकित की है । ध्यान रहे कसाब का मामला प्रणब दा के पूर्व का है लेकिन पूर्व महामहीम को अपने विदेशी दौरों फुर्सत नहीं मिल सकी । अतः इस मामले का श्रेय प्रणब दा को जाता है । उनके इस निर्णय ने भारत के इस संवैधानिक पद की गरिमा को बढ़ा दिया है ।
26 नवंबर के कुख्यात आतंकी अजमल कसाब की फांसी से पूरे विश्व में सकारात्मक संदेश मिला है । इस संदेश से ये स्पष्ट है कि कभी आतंकियों के लिये साफ्ट टार्गेट माना जाने वाला भारत भी आतंकियों को कठोर दंड दे सकता है । असल में देखा जाय तो आतंक के प्रति ढ़ुलमुल रवैया अपनाने की वजह से भारत आतंकियों का मनपसंद शिकारगाह बन गया । इस में आतंकियों से कहीं ज्यादा गलती उन सेक्यूलर लोगों की है जो देशद्रोही के मानवाधिकारों की वकालत करते नहीं थकते । ऐसे लोगों से मेरा एक सीधा सवाल है कि क्या आतंक से पीडि़त लोगों के मानवाधिकार नहीं होते? यदि होते हैं तो सैकड़ों लोगों को बेदर्दी से मार डालने वाले आतंकियों के कैसे मानवाधिकार ? बहरहाल जो बातें बीत गई उन पर बात करने से विशेष लाभ नहीं होता । यहां विचारणीय प्रश्न है हमारी सुरक्षा व्यवस्था और न्यायपालिका के सुराख । अगर हमारी सुरक्षा व्यवस्था चाक चैबंद होती तो क्या कसाब और उसका दस्ता भारत में इतनी बड़ी घटना को अंजाम दे पाता । और अगर हमारी न्यायपालिका पर सियासत हावी न होती तो कसाब कब का फांसी पर लटक चुका होता । इस सारी घटना से सबक सिर्फ इतना मिलता है कि हमें अपनी शासन व्यवस्था के ये दोनों सुराख बंद करने होंगे । ये करने के लिये हमें दृढ़ इच्छाशक्ति की आवश्यकता होगी । ये इच्छाशक्ति जो आज प्रणब दा ने दिखायी वो माननीया प्रतिभा जी भी दिखा सकती थी । किंतु उनके कार्यकाल को देखकर बहुधा ऐसा भ्रम हुआ किवे भारत का विदेश मंत्रालय संभाल रही हों ।
वस्तुतः अगर देखा जाय तो भारत मूलतः चर्चाओं का देश है । यहां चर्चाओं का बाजार हमेशा गर्म रहता है । अतः आज इस बड़े मुद्दे पर चर्चा तो लाजिमी है । कसाब की फांसी के साथ ही टीवी समेत विभिन्न सोशल नेटवर्किंग साइटों पर चर्चा का बाजार गर्म रहा । किसी ने कहा कि कसाब फांसी के पूर्व ही डेंगू से मर गया तो किसी ने उसकी फांसी पर ही संदेह जताया । आपरेशन एक्स के नाम से अंजाम दी गयी इस गोपनीय कार्रवाई की हकीकत देर सवेर तो सामने आ ही जाएगी । गृहमंत्री समेत विभिन्न बड़े अधिकारियों के कैमरे के सामने दिये गये बयान को अगर सच माना जाय तो कसाब मर चुका है । सोचने वाली बात है कि कोई भी व्यक्ति कैमरे के सामने इतना बड़ा झूठ बोल सकता है? जवाब हमेशा ना में ही मिलेगा । तो बेवजह कसाब के जीवित होने की आशंका जताने से क्या प्रयोजन ?
सबसे बड़ी बात ये भी है कि कसाब के मरने या ना मरने की बात प्रमुख विपक्षी दल भाजपा ने नहीं उठाई । अगर नहीं उठाई तो इसका सीधा सा अर्थ उसे भी कसाब की मृत्यु का पूर्ण विश्वास है । ऐसे में एक अच्छे फैसले की निंदा का कोई प्रयोजन नहीं है । ये समय है प्रणब दा और आपरेशन एक्स से जुड़े प्रत्येक व्यक्ति को बधाई देने का । ये समय है लोकतांत्रिक विजयादशमी मनाने का । जहां तक भारतीय राजनीति का प्रश्न है तो वास्तव में ये दिग्भ्रमित और दो धड़ों में विभक्त है। इसका पहला धु्रव है तथाकथित सेक्यूलर तो दूसरे धु्रव पर हैं दक्षिणपंथी विचारधारा के लोग । इनमें से सेक्यूलर आतंकियों के मानवाधिकार का रोना रोते हैं,तो दक्षिणपंथी अपनी विचारधारा का । गौर से देखा जाय तो दोनो का अपनी विचारधारा से कोई लेना देना नहीं रह गया है । यथा सेक्यूलरों को आतंकियों का दर्द तो दिखता है लेकिन सुरक्षाबल के जवानों की शहादत पर उनकी संवेदना मर जाती है । दूसरी ओर दक्षिणपंथी अपने दल को गंगाजल मान बैठे हैं अर्थात वो गलत हो ही नहीं सकते । इन दोनों के विस्तार को अगर देखें तो निश्चित तौर पर हम इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि इन दोनों का प्रयोजन देशप्रेम से तो कत्तई नहीं है। अगर ऐसा होता तो देश की सुरक्षा से संबंधित मुद्दों पर दोनों के मत एक हो जाते । अतः लोकतंत्र के पहरूओं से मेरा विनम्र निवेदन है सत्ता के इस सकारात्मक संदेश का स्वागत करें । अंततः प्रणब दा का ये निर्णय मुझे टीएन शेषन की याद दिला गया । आपको याद होगा कि चुनाव आयुक्त के पद पर बैठते है उन्होने बड़े बड़े राजनीतिक सुरमाओं को नाकेां चने चबवा दिये थे । संक्षेप में कहा जाए तो प्रणब दा के इस फैसले से बहुत सी उम्मीदें जगी हैं । आशा है कि वे भविष्य में इस तरह के सख्त निर्णय लेकर अपने पद को और भी गौरवान्वित करेंगे। कहने वाले कुछ भी कहें परंतु देश को राजेंद्र बाबू के बाद पहला ऐसा व्यक्ति मिला जिसने इस कुर्सी के प्रति अपनी उपयोगिता सिद्ध की है । अगर आपको मेरी ये बात गलत लगे भारतीय इतिहास में इस पद पर बैठै किसी अन्य व्यक्ति के ऐसे साहसिक निर्णय की मिसाल ढ़ूंढ़कर बताइये ।

Tuesday, November 20, 2012

स्ंतों की घटती स्वीकार्यता एक विवेचना: सिद्धार्थ मिश्र‘स्वतंत्र’

धर्म का मुख्य उद्देश्य है लोगों को सदाचारी  एवं सद्गुण संपन्न बनाना । वस्तुतः अपनी इन्ही आंतरिक विशेषताओं  के कारण धर्म की प्रासंगिकता प्रायः हर देश और समाज में एक समान  है । आपाधापी एवं सामाजिकता कटुता के तप्त मरूस्थल के बीच कल्पवृक्ष के रूप में विद्यमान है धर्म । अतः आज भी सांसारिक पक्ष से पीडि़त मनुष्य मंदिरों,मस्जिदों या चर्चों में शरण ढ़ूंढ़ता है । ध्यान देने वाली बात है कि अब मंदिरों मस्जिदों में भगवान नहीं मिलते । यहां अगर मिलते हैं तो भगवान और आम आदमी के बीच बैठे धर्म के बिचैलिये । वर्तमान परिप्रेक्ष्यों के आधार पर भगवान और भक्त के बीच बैठे इन्हीं बिचैलियों को संत कहा जाता है । अफसोस की बात तो यही है कि इन तथाकथित संतों का चरित्र संत शब्द के अर्थों की कसौटी पर खरा नहीं उतरता । हमारी सनातन मान्यताओं में सन्यास का अर्थ होता संसार से विरक्ति । यहां विरक्ति से आशय ये नहीं है कि वो कोई असामाजिक प्राणी है,यहां विरक्त होने का अर्थ है संसार की भौतिक संपदाओं से परे होना है ।
मान्यताओं के अनुसार मनुष्य के आध्यात्मिक विकास की राह में सबसे बड़ी बाधा है भौतिक संसाधनों की वासना । यहां वासना से आशय है कभी भी न बुझने वाली प्यास है । ध्यातव्य है कि भौतिक जरूरतों  का अंततः कोई अंत नहीं होता । यथा साइकिल से बाइक और फिर कार । सांसारिक मनुष्य की वासनाओं का कोई अंत नहीं होता । अगर यही वासनाएं संत या मौलवी कहे जाने वाले तथाकथित सर्वमान्यों के चरित्र में पाई जायं तो इसे क्या कहा जायेगा ?ध्यान दीजीयेगा आज संतों को ऐसा लगता है की उनकी पहचान उसके ज्ञान से नहीं बल्कि उनके संसाधनों से होती है । यथा वो टीवी पर कितनी बार आते हैं,कितनी लंबी गाड़ी में सफर करते हैं । इस बात को प्रमाणित करने के लिये मुझे अतिरिक्त प्रयास करने की आवश्यकता नहीं है । निर्मल बाबा सरीखे ढ़ेरों ऐसे सन्यासी मिल जाएंगे जो समोसे से किस्मत बदलने का दावा करते हैं । सबसे जरूरी बात ये है कि ये सभी तथाकथित  संत स्वयं को जिस परंपरा का झंडाबरदार बताते हैं,उनका अपनी गुरू परंपरा से भी कोई लेना देना नहीं होता । कहने का आशय है कि प्रत्येक महंत या मौलवी अपने शुरूआती दिनों में किसी ना किसी गुरू के सानिध्य में ज्ञान प्राप्त किया है । यहीं असली विरोधाभास खड़ा होता है ,मेरे या आप सब के जानने में लगभग सभी प्राचीन गुरूओ ं का जीवन त्यागमय रहा है । वे अपने सामान्य आवागमन के लिये पजेरो या सफारी के परतंत्र नहीं थे । शायद यही वजह रही कि वे मानव जीवन से जुड़ी समस्याओं को बखूबी समझते थे । ऐसे में उनके प्रति लोगों का झुकाव स्वाभाविक था ।
संत जीवन को समझने के लिये कबीरदास के ये दोहे समझने आवश्यक हैं ।
चाह गई चिंता गई मनवा बेपरवाह,जिनको कुछ नहीं चाहीये वो शाहन के शाह ।
सदा दिवाली संत घर , जो गुड़ गेहूं होय
इन दोनों पंक्तियों में एक संत के जीवन का समस्त सार तत्व समाहित है । इस बात को स्पष्ट करने के लिये मैं एक उदाहरण देना चाहूंगा । विश्व विजय पर निकलने से पूर्व सिकंदर अपने गुरू डायनोसिस से मिलने गया । उस वक्त वो एक गुफा में साधना कर रहे थे । सिकंदर उनके सामने पहुंचा तो उन्हेाने पूछ लिया कि तुम्हारी भावी योजना क्या है । सिकंदर ने कहा महाराज मैं विश्व विजय अभियान पर निकल रहा हूं । मेरी लक्ष्य पूरे विश्व पर एकत्र राज्य करना है । सिकंदर की ये बातें सुनकर उन्होने पूछा कि इससे क्या लाभ होगा । सिकंदर ने कहा महाराज मुझे प्रसन्नता होगी । सिकंदर से इस जवाब पर उन्होने कहा कि इसका विश्व विजय में क्या  संबंध है ? मैं तो स्वयं पर विजय पाकर ही प्रसन्नता पा गया हूं ।
यहां इस कथा को रखने का प्रसंग सिर्फ इतना ही है व्यक्ति की प्रसन्न्ता स्वयं उसमें अन्तर्निहीत होती है । वास्तव में मनुष्य की दुर्दशा की प्रमुख वजह है उसकी स्वयं की दुर्बलता । अब अगर ऐसे ही हालात स्वयं को ईश्वर का प्रवक्ता बताने वालों के भी हैं तो उन्हे सिद्ध तो कत्तई नहीं कहा जा सकता ? इस बात को समझाते हुये कबीर दास ने कहा था कि:
नहाये धोये का भया जो मन मैल न जाय,मीन सदा ज लमे रहे धोये बास न जाय
अर्थात व्यक्ति की वेशभूषा नहीं वरन उसकी चारित्रिक सुदृढ़ता उसके आत्म विकास की परिचायक होती है । अगर आपकी आत्मा शुद्ध नहीं है तो भगवा या धवल वस्त्र धारण करने से आप सन्यासी नहीं हो सकते । अगर गौर से देखा जाय तो आज कल ढ़ोगियों ने भगवा वस्त्र को सन्यासी का यूनीफार्म बना डाला है । हंसी तो तब आती है जब स्वयं एसी गाडि़यों में सफर करने वाले ये सन्यासी अपने प्रवचनों में त्यागमय जीवन शैली अपनाने को कहते हैं । एक ऐसी जीवन शैली जिससे उनका स्वयं दूर दूर तक कोई वास्ता नहीं । अतः संक्षेप में कहा जाय तो धर्म के ये ठेकेदार आज धर्म की फें्रचाइजी चला रहे हैं । जिसने जितना धन दिया वो उतना बड़ा धार्मिक । फिर चाहे वो धन काला हो या सफेद इनका प्रयोजन तो सिर्फ धन से है । अब बताइये कि ऐसे व्यक्तियों का क्या ईश्वर से साक्षात्कार हो सकता है । अफसोस होता है रोजना न्यूज चैनलों पे ढ़ोंगियों  के नये खुलासे देखकर । चोरी,तस्करी,बलात्कार जैसे संगीन अपराधों संलग्न लोगों को क्या सन्यासी कहा जा सकता है?
यहां ये बातें करने से मेरा ये आशय कत्तई नहीं कि मैं सन्यास की परंपरा का विरोधी हूं । मेरा विरोध इस परंपरा में आयी कुरीतियों से है । स्मरण आदि गुरू शंकराचार्य ने धर्म के रक्षार्थ पूरे भारत वर्ष में चार शंकराचार्य नियुक्त किये थे । आज के परिप्रेक्ष्य में देखीये तो शंकराचार्यों की संख्या कितनी है । वास्तव में भारत में धर्म देश हित से भी जुड़ा था । चाणक्य जैसे गुरू ने चंद्रगुप्त का निर्माण किया था । मुगलकाल में शिवाजी के गुरू समर्थ रामदास को कौन भुला सकता है । इस तरह के ओजस्वी सन्यासियों की परंपरा से भरा पड़ा है हमारा इतिहास । इसी परंपरा की आखिरी कड़ी थे स्वामी विवेकानंद । एक गुलाम देश के नागरिक की हैसियत से तमाम कष्टों को सहते हुये भी उन्हे पूरे विश्व के समक्ष भारत को गौरवान्वित किया । आज कहां है ऐसे सन्यासी? ऐसे सन्यासी देखे हैं आपने जिन्हे थैलियों से नहीं भक्त के भाव से प्रयोजन है ?अब तो सन्यासी बहुधा घोटालेबाजों के पाले में खेलने से भी बाज नहीं आते । अपने बेचने की धुन में राम से लेकर गंगा तक क्या क्या नहीं बेचा इन्होने । अत: आज के हालात को देखते हुये ये कहा जा सकता है कि संतों की सामाजिक स्वीकार्यता में जबरदस्त कमी  आई है । इसकी जिम्मेदारी निश्चित तौर पर आम जन से कहीं ज्यादा तथाकथित संतों पर है ।

Monday, November 19, 2012

वैज्ञानिक एवं धार्मिक आस्था का महापर्व है छठ पूजा: सिद्धार्थ मिश्र‘स्वतंत्र’

लोकआस्था का महापर्व छठ प्रत्येक वर्ष कार्तिक मास,शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से षष्ठी तिथि के बीच मनाया जाता है । शायद का ये संसार का पहला ऐसा पर्व है जहां उगते सूर्य के बजाय डूबते मार्तंड को अध्र्य दिया जाता है । अन्यथा सामाजिक मान्यताओं के अनुसार तो समाज उगते सूर्य को ही प्रणाम करता है । ऐसी ही कई अन्य अद्भुत संदेशों को स्वयं में समाये ये महापर्व प्रतिवर्ष भारत समेत जावा,मारिशस,त्रिनिदाद सुमात्रा जैसे कई देशों में मनाया जाता है । इस अवसर पर महिलाएं विशेष रूप से भुवन भाष्कर सूर्य से उनके सदृश तेजस्वी पुत्र पाने की कामना करती हैं । अर्थात इस पर्व के मूल में है सुहागिन स्त्रियों द्वारा षष्ठी माता से अपने पुत्र के लिये मंगल की कामना । इस बात को छठ पर्व के अवसर पर गाये जाने वाले  विभिन्न गीतों से भी समझा जा सकता है ।
छठ महापर्व की महत्ता को समझने के लिये हमें विभिन्न ऐतिहासिक संदर्भों का सूक्ष्मता से अवलोकन करना होगा । देवी भागवत के मतानुसार सृष्टि की रचनात्मक एवं क्रियात्मक शक्ति जिन्हे समस्त समस्त सृष्टि का उत्स भी कहा जा सकता है स्वयं सर्वेश्वरी आद्या शक्ति मां दुर्गा हैं । मां के समस्त स्वरूपों के विभाजन में छः मूल रूप हैं इन्हे राधा,मां दुर्गा,मां महालक्ष्मी,मां महाकाली,मां सरस्वती एवं मां चामुण्डा । मां के इन समस्त स्वरूपों को समझने के उपरांत वस्तुतः सृष्टि का कोई भी गूढ़ रहस्य समझने की आवश्यकता नहीं रह जाती । देवी के इन समस्त स्वरूपों में रचनात्मक एवं क्रियात्मक कार्यों का संपादन कराने का श्रेय  उपशक्तियों को जाता है । महामाया दुर्गा की इन्ही उपशक्तियों के बहुविध नामों में सर्वप्रमुख नाम है मां षष्ठी का । अतएव संतान की मंगल कामना से प्रेरित होकर स्त्रियां इस महापर्व को मनाती हैं ।
मता षष्ठी का मुख्य कार्य है संपूर्ण मानव संतति की रक्षा करना । अतः मां षष्ठी का प्रथम पूजन आज भी सनातन धर्मियों द्वारा तब होता है,जब कोई नवजात छः दिन का होता है । अर्थात शिशु की छठी मनाने के मूल में भी मां षष्ठी की पूजा ही छुपी है । चार दिनों तक चलने वाले इस महापर्व की शुरूआत भैया दूज के तीसरे दिन होती है । सांस्कृतिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन को नहा खाय कहा जाता है । इस दिन श्रद्धालु स्त्रियां गंगा नदी में स्नान के उपरांत वहां से लाये पवित्र जल से घर की शुद्धि करती हैं ततपश्चात पश्चात कद्दू की सब्जी के साथ शुद्ध भोजन ग्रहण करती हैं । इस मान्यता के पीछे भले ही गूढ़ हो लेकिन एक सामान्य सा संदेश है लोगों का प्रकृति से जुड़ाव । ध्यातव्य हो आपाधापी के वर्ष के सारे दिन स्त्रियां भले ही नदियांे से दूर रहती हों पर इस एक दिन उन्हे नदियांे की शरण में जाना ही पड़ता है । दूसरे तरीके से देखा जाय तो पूरे विश्व की प्यास बुझाने वाली ये नदियां वास्तव में मातृ स्वरूपा हैं । अतः लोगों को मातृ शक्ति से जोड़े रखने के लिये इस पर्व की पूजा नदियों के तट पर ही की जाती है।
स्मरण रहे कि संपूर्ण सृष्टि का निर्माण मूल रूप से पांच तत्वों से ही हुआ है । इन पंचतत्वों के प्रधान हैं सूर्य देव । सौरमंडल की समस्त गतिविधियों के नियंता हैं अतः षष्ठी पर्व को सूर्य उपासना के साथ सनातन परंपरा में संबद्ध कर दिया गया । पौराणिक रूप से अगर देखा जाये सूर्य पूजन से संयुक्त षष्ठी का सर्वप्रथम साक्ष्य अंगराज कर्ण द्वारा किये गये पूजन के रूप में होता है । चूंकि छठीं शताब्दी में अंग प्रदेश को मगध में मिला लिया गया था अतः इस पूजा के सर्वप्रथम साक्ष्य मगध में ही मिलते हैं । मगध का आशय यहां वर्तमान बिहार से है । बिहार में आज भी ये पर्व सबसे बड़े पर्व के रूप में ख्यातिलब्ध है । इस पूजा के कारण ही मगध प्रदेश प्राचीन काल में पूरे भारत वर्ष को संचालित करता था । आज भी अगर देखा जाय तो भारत की वर्तमान राजनीतिक दशा एवं दिशा इन सूर्य उपासक राज्यों पर केंद्रित है । अर्थात भारतीय राजनीति के परिप्रेक्ष्य में उत्तर प्रदेश एवं बिहार बड़ी धूरी बने हुए हैं । इन सबका श्रेय जाता है भगवान भुवन भाष्कर को । भारत समेत विश्व की अनेक सभ्यताओं में सूर्य को शक्ति का प्रतीक माना गया है ।
जहां तक इस पर्व की वैज्ञानिक मान्यताओं का प्रश्न है तो वो बिल्कुल स्पष्ट है । वैज्ञानिक एवं ज्योतिष शास्त्र के दृष्टिकोण से भी देखा जाये तो षष्टी एक विशेष खगोलीय अवसर है । इस अवसर पर सूर्य पृथ्वी के दक्षिणी गोलार्द्ध में कंेद्रित होता है ।ऐसे में सूर्य की दूषित किरणों का सीधा प्रभाव मानव के शरीर पर पड़ता है । ध्यान दे ंतो शाम एवं सुबह के समय सूर्य की ये बेधक किरणें श्रद्धालुजन को कोई नुकसान नहीं पहुंचाती । उपरोक्त आधारांे पर अगर देखा जाय तो इस व्रत के पारन एवं पूजन में इन वैज्ञानिक महत्व की बातों को भी समाहित किया गया है । संक्षेप मंे कहा जाय तो अपनी इसी विशिष्टता के कारण ही इस पर्व की वैज्ञानिक महत्ता को भी नकारा नहीं जा सकता ।
वस्तुतः छठ विश्व के प्राचीनतम पर्वों में से एक है । रामायण काल मे मां सीता,महाभारत काल में मां कुंती द्वारा इस व्रत को किये जाने के साक्ष्य हमारे पुराणों में मिलते हैं । इन ओजस्वी माताओं के यशस्वी पुत्रों की गौरव गाथा से हमारा इतिहास भरा पड़ा है । अतः अपने पुत्रों के यशवर्द्धन मंगलकामना से अभिप्रेरित होकर माताएं प्रतिवर्ष इस दुरूह व्रत को करती हैं । संक्षेप में अगर कहा जाये तो आमजन को प्रकृति,आस्था एवं वैज्ञानिक आधारों से जोड़ने वाला महापर्व है छठ ।

Friday, November 16, 2012

दागी बागी और परिवार,वाह रे समाजवादी सरकार: सिद्धार्थ मिश्र‘स्वतंत्र’

सूबे में समाजवादी पार्टी के युवा  नेतृत्व में चल रही सरकार से भले ही समाजवादियों को अक्सर ही फील गुड होता रहता है । इस बात की बानगी चैक चैराहों पर घूमते घामते सपा के कार्यकर्ताओं के तेवर से जानी जा सकती है । उत्साह से भरे सपाइयों के सुर कल तब बिगड़ गये जब माननीय मुलायम जी ने आगामी लोकसभा चुनावों के लिये अपने प्रत्याशियेां के नामों की घोषणा की ।ऐसा होना लाजिमी भी था क्योंकि उनकी इस सूची को देखकर तो यही लगता है कि उनके शब्दकोष में फिलहाल के समाजवाद शब्द के ध्वंसावशेष भी नहीं बचे हैं । अर्थात समाजवाद की उनकी नयी नवेली व्याख्या फिलहाल सत्य और समाजवाद से कोसों दूर है । कल घोषित हुई 55 उम्मीदवारों के सूची में दागियों बागियों और मुलायम समेत सपा के बड़े नेताओं के परिवारों का दबदबा साफ दिखाई दिया । अब वाकई अगर यही समाजवाद है तो समाजवाद की ये व्याख्या वाकई पुरनिये समाजवादियों की समझ से भी परे हैं ।
कल की घोषित प्रत्याशियों की सूची में मुलायम परिवार से डिंपल यादव,धर्मेंद्र यादव,अक्षय यादव शामिल हैं । हांलाकि आने वाली सूची में मुलायम जी के दूसरे पुत्र प्रतीक यादव का नाम जुड़ने की पूरी संभावना है । इसी तरह सपा के कुख्यात विधायक विजय मिश्र की सुपुत्री सीमा मिश्रा को भदोंही से,पंचायती राज्यमंत्री कमाल अख्तर की पत्नी हुमेरा को अमरोहा से,कृषि मंत्री आनंद सिंह के पुत्र कीर्तिवर्धन सिंह को गोंडा से और उद्यान मंत्री राजकिशोर सिंह के भाई बृज किशोर सिंह को बस्ती से टिकट दिया गया है । इस फेहरिस्त में अभी और भी विवादित एवं परिवारिक जनों के शामिल होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता । हांलाकि पार्टी प्रवक्ता और महासचिव रामगोपाल यादव ने सूची जारी करते हुये कहा कि अपने अधिकृत उम्मीदवारों की सूची सबसे पहले जारी करके सपा ने अन्य दलों पर बढ़त बना ली है । अब उनके इस अति आत्मविश्वास को क्या कहा जाये । बहरहाल सपा के इस प्रकार के टिकट बंटवारे कार्यकर्ताओं का मनोबल अवश्य गिरा है । अंततः सपा के इस नव समाजवाद को देखते हुये यही कहा जा सकता है कि दागी बागी और परिवार,वाह रे समाजवादी सरकार ।